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Archive for the 'Dainik Jagran' Category

आत्मकेंद्रित दृष्टिकोण

Monday, December 28th, 2009

2010 की आहट अजीब कुहासे भरी दिखती है। सूखती नदिया, सिकुड़ते ग्लेशियर और घटते जंगल एक ओर हैं तो दूसरी ओर गरीबी का विस्तार थम नहीं रहा। शहरों और गावों में गरीब न केवल बढ़े हैं, बल्कि उनका जीवन पहले से ज्यादा कष्ट साध्य हुआ है, जिसके सामने अमीरों का बढ़ता प्रभाव-विस्तार और सामाजिक-राजनीतिक विषमता देश को अतिवादी हिंसा तक ले जा रही है। कश्मीर से हिंदुओं के निष्कासन के दो दशक पूरे होने की तिथि जब निकट आ रही है तो घाव पर नमक के समान सगीर अहमद रपट लाकर कश्मीर को अजीब स्वायत्तता देने की चर्चा है। तब देश की एकता के लिए क्या फिर किसी श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान की आवश्यकता होगी? सामाजिक स्तर पर न्याय, समृद्धि और उन्नत जीवन के अवसर केवल उन लोगों तक सीमित होते जा रहे हैं जो अंग्रेजी पढ़े लिखे और साधन संपन्न हैं। देश का अखिल भारतीय स्वरूप राजनीति और पत्रकारिता में सिकुड़ता दिखता है, एक के लिए वोट बैंक देश का प्रतिरूप है तो दूसरे के लिए वही क्षेत्र मिलकर देश बनाते हैं जहा उसका प्रभाव है। रुचिका कांड में न्याय का उपहास या तेलगाना के प्रश्न पर विभ्रम जनित अराजकता टुकड़ों-टुकड़ों में बंटी खंडित दृष्टि का परिणाम है। पुलिस से राजनेता अपने सही गलत सब कार्य करवाते हैं। पुलिस जनसेवक नहीं, तबादले-पोस्टिंग और कमाई के लिए नेताओं की हस्तक बनाई जाती है-फलत: ईमानदार अफसर सजायाफ्ता की तरह किनारे धकेले जाते हैं और राठौर जैसे हर मुख्यमंत्री की आख का तारा बन जाते हैं। जब सुरक्षा के प्रमुख ही आत्मकेंद्रित द्वीप हों तो जनता किससे उम्मीद करे? यही हाल पत्रकारिता का हो रहा है। मीडिया का मायाजाल सही-गलत के फर्क को ही धूमिल नहीं कर रहा, बल्कि चौथे स्तंभ के प्रति जन-आस्था को डिगा रहा है। पत्रकारिता जाबाज कलम-धर्मियों का क्षेत्र है, पर वह भी आत्मकेंद्रित द्वीप में बदल जाएगी तो भारत कहा छपेगा?

तेलंगाना में जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ राष्ट्रीय एकता और समग्र भारतीय दृष्टि के लिए बेहद क्षतिकारक है। आखिर किसी भी प्रांत के उपक्षेत्र को अलग अस्तित्व बनाने की माग करने पर बाध्य ही क्यों होना पड़ता है? यह तब होता है जब द्वीप देश से बड़े होने का अहंकार पालने लगते हैं। नागालैंड या मणिपुर या लद्दाख से उनका नाता रिश्ता सिर्फ तभी तक रहेगा जब तक उनको वहा से कुछ मिलेगा? उनके लिए देश श्री अरविंद के शब्दों में साक्षात् जगत्जननी का स्वरूप नहीं, बल्कि एक प्लेटफार्म है, अपनी व्यक्तिगत वासनापूर्ति की रेलगाड़ी पकड़ने के लिए। जब ऐसे द्वीप-दृष्टि वाले सत्ता में आते हैं या प्रशासन और साहित्य में दखल देते हैं तो खंडित समाज का सृजन होता है। ऐसा मंडल के समय हुआ, राजेंद्र सच्चर कमेटी ने यही काम किया। गंगा सफाई अभियान में गड़बड़ करने वालों का भी यही पाप है तो उनका भी जो गंगा के अविरल प्रवाह को बाधित कर राष्ट्र की मूल धरोहर के साथ छल कर रहे हैं-तनिक अधिक आराम से रहने की खातिर वे अपने पूर्वजों द्वारा संजोयी विरासत को ही दाव पर लगा रहे हैं। यह भी द्वीपीय खंडित दृष्टि का फल है-सिर्फ मैं और मेरे इर्द-गिर्द का हित, बाकी की परवाह नहीं। हाल ही में एक फिल्म घोषित हुई है-माई नेम इज खान अर्थात मेरा नाम खान है। देश के लाखों दिलों के प्रिय अभिनेता शाहरुख खान इसके नायक हैं। खान होने के कारण उन्हें अमेरिका में जो कथित अपमान झेलना पड़ा उसका इसमें वर्णन है। इसके पहले एक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में शाहरुख खान ने घोषित किया कि ‘वह इस्लाम के वैश्विक दूत’ यानी एंबेसडर हैं। अच्छी बात है। उन्हें उन अमेरिकी सुरक्षाकर्मियों ने जाच से गुजारा जो अपने देश में पुन: 9/11 नहीं होने देना चाहते थे। इसमें आपत्ति की क्या बात है? अगर आज ज्यादातर जिहादी आतंकवादी खान होने का दावा करते हैं तो शाहरुख साहब को उनके आतंक का शिकार होने वालों के साथ खड़े दिखना चाहिए या अपनी जाच को अपना अपमान मानकर उस पर फिल्म बनानी चाहिए? उन लाखों कश्मीरी देशभक्त भारतीयों के उजड़ने, कत्ल होने और स्वतंत्र देश में शरणार्थी बनने की व्यथा क्या शाहरुख की अमेरिकी पुलिस द्वारा जाच यानी जूता-जुराब उतारने से कम दुखदायी और इसलिए महत्वहीन है? शाहरुख खान आज ‘बादशाह’ क्या इस बदौलत हैं कि वह ‘इस्लाम के एंबेसडर’ हैं या इसलिए हैं कि वह बेहद अच्छे अभिनेता, अच्छे भारतीय हैं और इस कारण देश के लाखों-करोड़ों हिंदू भी उन्हें अपना प्रिय स्टार मानते हैं? उनके मन में खान के नाते खड़े होने के बजाय उस कौल या रैना या भट्ट के दर्द को साझा करने का विचार क्यों नहीं आया?

यह है द्वीप-दृष्टि जो भारत की समग्रता के महासागर को अपने भीतर समाने के बजाय उससे पृथक रहने में अपना भविष्य देखती है। देश ऐसे द्वीपों से नहीं बनते। देश बनते हैं एक राष्ट्रीयता, एक सामूहिक विराट स्वप्न, एक जन और संस्कृति के अधिष्ठान से, जहा के लोग एक दूसरे के सुख-दुख में अपना सुख-दुख महसूस करें। 2010 का वर्ष, हालाकि हमारा अपना भारतीय वर्ष तो चैत्र शुक्ल प्रथम, वर्ष प्रतिपदा के दिन ही मनाया जाएगा, भारत सहित विश्व में गहरे बदलाव लाने वाला है। ये बदलाव भाषा, तकनीक, राजनीतिक व्यवहार और मेहनतकश जनता के प्रति रवैये को भी प्रभावित करेंगे। आखिर क्यों विकास केवल शहर केंद्रित रहे और किसान आत्महत्याएं करें तो उसकी तुलना में बालीवुड की अभिनेत्री की शादी या राजनेता का सुपुत्र ज्यादा महत्व की सुर्खिया पाए? देश का युवा पुराने चोले को फेंकने, रंगरूप, मुहावरों और चलन का साथी बना है। जो यह पहचानेगा और समग्र भारतीय दृष्टि के साथ अपनी धुरी पर टिका रहेगा वही जीतेगा।

थाईलैंड में बौद्ध-हिंदू समन्वय

Monday, December 14th, 2009

बैंकाक नगर में चारों तरफ जिस भाषा और बौद्ध पंथ के दर्शन होते हैं उनमें भारत झलकता है। गणपति घर-घर में पूजे जा रहे हैं। कुछ वर्र्षो से गणेश चतुर्थी का उत्सव भी काफी धूमधाम से मनाया जाता है। यहां के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम शुद्ध संस्कृत में सुवर्ण भूमि रखा गया है और राजा को तो रामनवम् की पदवी से अलंकृत किया गया है, क्योंकि वहां राम के नाम पर शासन करने की राज परंपरा में गणपति, शिव, हनुमान, कार्तिकेय, लक्ष्मी आदि देवी-देवताओं की पूजा का प्रचलन भी बढ़ा है। इसी परंपरा में चीनी मूल की अत्यंत प्रसिद्ध सिद्ध योगिनी समान थाई बौद्ध भिक्षु ने अपने कायरें से थाईलैंड में अद्भुत कीर्ति अर्जित की है। अस्सी वर्षीया इस बौद्ध भिक्षु का नाम है क्यों सोंग है, जिन्होंने गत चालीस वषरें से निरंतर अपनी साधना के बल पर विराट बौद्ध मंदिर बनवाए और उनमें शिव का प्रमुख स्थान रखा। वह शिवभक्त हैं। बौद्ध मंदिर के अलावा एक पृथक अत्यंत विशाल शिव मंदिर भी उन्होंने बनवाया है जो थाईलैंड में हिंदू दर्शनार्थियों के अलावा स्थानीय थाई बौद्ध मतावलंबियों के लिए वृहद आकर्षण का केंद्र बना है। लगभग सौ फीट ऊंची शिव प्रतिमा, त्रिशूल और नंदी सहित थाई मंदिर के भीतर हजार शिवलिंग विशाल भवन में एक रोमांच पैदा करते हैं। वहां सबसे पहले मुझे मेरे मित्र दिनेश दुबे ले गए और वहां जाकर देखा कि माताजी ने अपनी शिष्या के रूप में शरण्या और एक बेटी के नाते तनुश्री को मातृवत वत्सलता से अंतरंग बनाया हुआ है। थाई देश की इस महिमावान माता का भारत प्रेम निष्छल और निर्मल है। वह अपने मंदिर की ओर से अनेक अनाथ बच्चों की शिक्षा तथा लालन-पालन की भी पूरी व्यवस्था करती हैं। उनके मंदिर तथा आश्रम में केवल शुद्ध शाकाहारी भोजन मिलता है। गत सप्ताह उनकी चालीस वर्षीया साधना के परिणामस्वरूप एक बहुमंजिले पगोड़ा की प्राण प्रतिष्ठा का अनुष्ठान संपन्न हुआ, जिसमें शाही राजकुमारी ने भाग लिया। इन पगोड़ा में दस हजार बुद्ध प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। मुख्य प्रतिमा देवी दुर्गा के सहस्त्र हाथों वाली है, जिसे अवलोकितेश्वर का उमा रूप माना जाता है। उसकी यहां पूजा होती है और बौद्ध मंत्रों में भी उमा देवी के नाम का जाप किया जाता है। इस पगोड़ा की इक्कीस मंजिलें हैं और प्रत्येक मंजिल पर विश्वभर से लाए गए बुद्ध, गणेश, शिव, लक्ष्मी, काली, दुर्गा आदि देवताओं की सुंदर कलात्मक शिल्पकृतियां रखी गई हैं। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस संपूर्ण महिमावान कृति को राज परिवार और राजनेताओं का सीमा रहित समर्थन प्राप्त है। एक बौद्ध देश में महायान के माध्यम से बौद्ध भिक्षुणी की तपस्या का यह विराट रूप किसी भी दर्शनार्थी को प्रथमदृष्ट्या अभिभूत कर देता है। उनकी जीवनकथा भी बहुत रोमांचक है। बचपन में उनका विवाह हुआ था, दो बेटे हैं और पांच पोते-पोतियां। उनके पतिदेव ईसाई थे, परंतु अपनी पत्नी की अपार बुद्ध भक्ति देखकर उन्होंने बौद्ध मत का अनुशीलन किया और कालांतर में स्वयं बौद्ध भिक्षु बन गए। उनके देहांत के बाद माता सी कुंगसेन ने अपना सारा जीवन बौद्ध मत के प्रचार और थाईलैंड के बच्चों की शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया। वह उत्तरी थाईलैंड के वनवासी बच्चों में स्कूल और संस्कार केंद्र भी चला रहीं हैं। राजकुमारी चुलाभरन के कैंसर रिसर्च सेंटर के लिए भी वह सहायता दे रही हैं। रोचक बात यह है कि उनके शिष्यों में मुस्लिम भी हैं। बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि थाईलैंड में मुस्लिम समाज में अरबी नाम रखने का रिवाज नहीं है। वे थाई भाषा के नाम रखते हैं, जैसे कंचना सुवाभुम एक मुस्लिम महिला अधिकारी हैं, जो इन थाई माताजी की प्रिय शिष्या हैं। उनका कहना है कि माताजी का व्यवहार ही ऐसा है कि उनको उसी में ईश्वर के प्रेम की अनुभूति होती है। थाई माताजी का अब अगला स्वप्न है कैलास मानसरोवर यात्रा पर जाना और शिव-शक्ति के दर्शन करना। वे इस आयु में भी एक तरुण युवती की भांति सक्रिय और सदा कार्यरत रहती हैं। उनको अचानक शिवभक्ति का कैसे ध्यान हुआ? इसके उत्तर में उनका कहना है कि कुछ वर्ष पूर्व उनको स्वप्न में शिव दर्शन हुए थे, तभी से उनके हृदय में शिवजी के प्रति गहन श्रद्धा उमड़ आई। उनके जीवन का एक अंतिम स्वप्न यह भी है कि इस शिवमंदिर में वह कैलास मानसरोवर की साक्षात प्रतिकृति बनवाएं, ताकि जो लोग स्वयं कैलास पर्वत के दर्शन नहीं कर सकते वे यहां आकर उनके रूप की पूजा कर सकें। थाई माताजी की साधना के कारण थाईलैंड में हिंदू तथा बौद्ध समन्वय का असाधारण अभूतपूर्व अध्याय रचा गया है जिससे भारत को भी प्रेरणा लेनी चाहिए और जो लोग धर्म के नाम पर हिंदू-बौद्ध समन्वय तोड़ने का प्रयास करते हैं उनको इन महान थाई माताजी के करुणामय तथा सर्व समन्वयवादी दृष्टिकोण से शिक्षा लेनी चाहिए।

विकृत होती पंथनिरपेक्षता

Monday, October 19th, 2009

पिछले तीन दशकों से जम्मू-कश्मीर में जारी आतंकवाद के दौरान पांच लाख से अधिक हिंदुओं को उनके घरों से उजाड़ कर दर-दर भटकने के लिए मजबूर कर दिया गया। घाटी में जो सात सौ से अधिक मंदिर हैं, वे सब सूने हैं। वहां कोई दीया जलाने वाला भी नहीं जा पाता। परंतु इस देश के राजनेता और कलम का धर्म निभाने की जिम्मेदारी लिए लोग इन पांच लाख हिंदुओं की करुण व्यथा भूल गए। ऐसे आत्म विस्मृत समाज में क्या कोई आशा कर सकता है कि जम्मू में आंचल (जिसका विवाह के पूर्व का नाम अमीना था) के घर दीवाली नहीं मनी तो उसके कारण जाने जाएं? आंचल के पति रजनीश शर्मा का अमीना से प्रेम हो गया और दोनों ने शादी कर जिंदगी एक साथ बिताने का निश्चय किया। दोनों ने जम्मू आकर 21 अगस्त को शादी कर ली। 29-30 सितंबर की रात को कश्मीर से आई पुलिस ने चुपचाप रजनीश के घर दबिश दी और उसे उठाकर श्रीनगर ले गई। रजनीश फिर जम्मू नहीं लौटा। उसकी लाश लाई गई, जिस पर भयंकर यातनाओं के निशान थे। कश्मीर पुलिस ने कहा कि रजनीश ने थाने में आत्महत्या कर ली, लेकिन आंचल उर्फ अमीना ने बहादुरी से अपने दिवंगत पति को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उसके मां-बाप ने कश्मीर पुलिस को रिश्वत देकर रजनीश की हत्या करवा दी। हैरानी की बात है कि इस हृदय विदारक घटना की देश में कहीं भी गूंज सुनाई नहीं पड़ी। वे मानव अधिकारवादी, जो कोलकाता में रिजवान की घटना पर इतना चिल्लाए थे जितना चीन की घुसपैठ पर भी नहीं बोले, रजनीश और अमीना अर्थात आंचल की शोकांतिका पर चुप रहे। आखिर क्यों? यह भी ध्यान देने की बात है कि क्या कहीं भी किसी स्त्री अधिकार संगठन ने महिला आयोग को कार्यवाही के लिए पुकारा? जो महिला आयोग राखी सावंत के फिल्मी स्टंट पर तुरंत सक्रिय हो उठा था, वह अमीना या आंचल की करुणामय कथा पर चुप्पी क्यों ओढ़े हुए है? यह घटना भारतीय शासन और राजनीति में व्याप्त सेक्युलर विद्रूपता का प्रमाण है जो हिंदू हनन को ही अपनी पहचान बना बैठा है। कश्मीर घाटी सामान्य हिंदुओं और बौद्ध समाज पर अत्याचार करने वाली सत्ता का प्रतीक बनी है। कुछ समय पहले श्री अमरनाथ भूमि के लिए हुए असाधारण आंदोलन ने यह तथ्य प्रकट किया ही था और उस समय श्रीनगर की अहंकारी सत्ता को झुकना पड़ा था। फिर भी जम्मू के लिए घोषित केंद्रीय विश्वविद्यालय को श्रीनगर ले जाया गया। हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर भी कश्मीर की सत्ता का घोर सांप्रदायिक दृष्टिकोण बार-बार प्रकट होता रहता है। लद्दाख के बौद्ध समाज की भी यही शिकायत रही है। उनकी लड़कियों को भगाकर श्रीनगर ले जाया जाता है और उनका मतांतरण कर दिया जाता है। कश्मीर घाटी भारत में सांप्रदायिक विद्वेष और भारत द्रोह का उदाहरण क्यों बना है? उल्लेखनीय है कि भारत में केवल जम्मू-कश्मीर ऐसा प्रांत है, जो पूरी तरह से मुस्लिम बहुल है। एक मुस्लिम बहुल प्रांत अपने राज्य में अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार करता है, इसका ज्वलंत उदाहरण जम्मू-कश्मीर सरकार के कामकाज से प्रकट होता है। भारत में ही नहीं, दुनिया में जहां भी मुस्लिम अल्पसंख्यक होते हैं वहां वे अपने लिए विशेष अधिकार, अतिरिक्त आरक्षण और मजहबी कानून आदि की मांग करते हैं और हासिल भी कर लेते हैं, परंतु जहां वे स्वयं बहुसंख्यक होते हैं, वहां गैर-मुस्लिम समाज के अल्पसंख्यकों के अधिकार समाप्त कर देते हैं और उनकी आस्था एवं जीवनशैली की स्वतंत्रता को कुचल देते हैं। श्रीनगर में बैठे शासकों का हिंदू-कश्मीरियों तथा जम्मू निवासियों के प्रति व्यवहार इस बात का प्रमाण है। आंचल ने बड़ी हिम्मत से इस विभीषिका का सामना किया है। उसने कश्मीर सरकार की अनुकंपा राहत राशि भी अस्वीकार कर दी है और कहा है कि अगर उसको या उसके दिवंगत पति के परिवार को कोई हानि होती है तो उसकी जिम्मेदारी उसके पिता और कश्मीर शासन पर होगी। आंचल ने यह भी आरोप लगाया है कि उसके पति रजनीश को इस्लाम कबूल करवाने के लिए श्रीनगर के एक थाने में भयंकर यातनाएं दी गईं, नाखून उखाड़े गए, घुटने तोड़े गए और बिजली के करंट भी लगाए गए। फिर भी उसने अपना धर्म बदलना स्वीकार नहीं किया। आंचल ने मांग की है कि हमें सरकार से केवल एक ही मुआवजा चाहिए और वह यह कि दोषी पुलिसकर्मियों और आंचल के पिता मोहम्मद यूसुफ मेराजी तथा भाइयों के खिलाफ धारा 302 के अंतर्गत हत्या का मुकदमा दर्ज करे। यह घटना भारत की और अधिक विकृत होती पंथनिरपेक्षता की प्रतीक बन गई है। क्या वास्तव में इस देश में अब हिंदुओं को न्याय नहीं मिल सकता?

आत्मघाती आत्ममुग्धता

Tuesday, October 6th, 2009

चीन की ओर से मिल रही चुनौती के संदर्भ में भारत की प्रतिक्रिया को असंतोषजनक मान रहे हैं तरुण विजय

भारत-चीन सीमा विवाद गत छह दशकों से लगातार चल रहा है। 1956 में चीन ने जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में अक्षय चिह्न (अक्साई चिन) क्षेत्र का 43,180 वर्ग किलोमीटर इलाका धोखे से हड़प लिया था। इसके बाद 1963 में पाकिस्तान ने गुलाम कश्मीर का 5180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन को भेंट कर दिया था। इसके अलावा चीन भारत में अरुणाचल प्रदेश में लगभग 90 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर अपना दावा करता है और अरुणाचल प्रदेश के किसी भी व्यक्ति को चीन यात्रा के लिए वीजा देने से यह कहते हुए इनकार कर देता है कि वहां के लोग तो चीन के ही हैं, इसलिए उन्हें वीजा लेने की आवश्यकता नहीं है। 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने मकमहोन लाइन को भारत-चीन सीमा मानने से इनकार करते हुए लद्दाख और नेफा (वर्तमान अरुणाचल प्रदेश) पर हमला बोल दिया था। एक महीने बाद चीन के एकतरफा युद्ध विराम के बाद यह युद्ध बंद हुआ, परंतु भारत को अपार क्षति हुई। भारत ने तिब्बत स्वायत्तशासी प्रदेश को चीन का अविभाज्य हिस्सा मानने की भयंकर भूल की है, जबकि चीन के नक्शों में अभी तक सिक्किम को स्वतंत्र देश व कश्मीर को विवादास्पद क्षेत्र दिखाया जाता है। चीन के साथ सीमा विवाद सुलझाने के लिए वार्ता के 13 दौर हो चुके हैं, परंतु अभी तक ये बेनतीजा रहे हैं। यही नहीं, हर वर्ष भारतीय सीमा में चीन की घुसपैठ और शरारतें बढ़ती ही गई हैं। लद्दाख सीमा के भीतर चीनी सैनिकों की घुसपैठ और मील के पत्थरों पर चीन लिखने की खबरें अखबारों में छाई रहीं, परंतु प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने इनको विशेष महत्व नहीं दिया। वास्तव में यही चीन की सफलता है। उसने भारतीय सीमा में अपने दावों को भारतीय सहनशीलता के दायरे में ला दिया है। धीरे-धीरे उसने अरुणाचल पर चीनी हक का दावा ठोंक दिया। चीन की छोटी-मोटी घुसपैठ, जो उसकी वृहत्तर रणनीति के महत्वपूर्ण कदम हैं, भारत की सत्ता में दो कारणों से चिंता का कारण नहीं बनती। एक तो सरकार सोचती है कि चीन की तो यह आदत ही हो गई है। इसे नजरअंदाज करना ही ठीक है और दूसरा कारण यह कि भारत चीन से नाराजगी मोल नहीं लेना चाहता, क्योंकि न तो उसकी चीन की तुलना में सैन्य तैयारी है और न ही पाकिस्तान के साथ-साथ वह चीन को भी सक्रिय शत्रु की श्रेणी में ला खड़ा करना चाहता है। चीन का आर्थिक और सैन्य बल भारत की तुलना में कई गुना बढ़ गया है। 1980 में भारत की प्रति व्यक्ति औसत आय 917 डालर थी और चीन की 556 डालर। अब 8.5 प्रतिशत विकास दर के साथ चीन ने प्रति व्यक्ति आय 4,766 डालर तक पहुंचा दी है, जबकि 5 प्रतिशत विकास दर के औसत से भारत की प्रति व्यक्ति आय 2,534 डालर तक ही पहुंच सकी है। चीन का सैन्य बजट भारत से चार गुना अधिक है। इस कारण पिछले एक वर्ष से भारत के प्रति उसका दुराग्रही और आक्रामक रवैया अधिक मुखर हुआ है। इसके पीछे चीन का अपनी शक्ति के प्रति विश्वास और भारत की दुर्बलता के प्रति तिरस्कार है। कुछ समय पूर्व मुझे चीन के सिचुआन विश्वविद्यालय में आमंत्रित किया गया था। वहां भारत-चीन संबंधों पर मेरे तीन व्याख्यान हुए। उन्हीं दिनों अरुणाचल के संदर्भ में चीन के दिल्ली स्थित राजदूत का बयान चर्चा में था। मैंने कहा कि यदि चीन अरुणाचल पर अपना दावा बनाए रखता है तो भारत को उसके साथ व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध बढ़ाने में कठिनाई होगी। जिस आधार पर चीन अरुणाचल पर एक भ्रामक दावा पेश करता है उससे कहीं अधिक प्रबल दावा भारत का कैलाश मानसरोवर क्षेत्र और त्रिविश्टप यानी तिब्बत पर बनता है। मेरे व्याख्यान के बाद वहां के एक वरिष्ठ समाजशास्त्री मेरे पास आए और बोले, मेरे मित्र, चीन को पूरा आत्मविश्वास है कि वह एक दिन अरुणाचल ले लेगा। क्या वजह है इस आत्मविश्वास की? चीन को अपने प्रखर राष्ट्रवाद की ताकत और निरंतर लक्ष्य के प्रति अविचलित निष्ठा से बढ़ते जाने की नीति पर भरोसा है। वह भारत के राजनीतिक दलों की आपसी लड़ाई और माकपा जैसी पार्टियों के परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन से उत्साहित है। उसे विश्वास है कि भारतीय लोकतंत्र में जिस प्रकार व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का प्रभाव बढ़ा है और दलीय स्वाथरें की वेदी पर राष्ट्रीय हितों की बलि दिया जाना सामान्य बात हो गई है, उस कारण कभी भी ऐसा मौका आ सकता है कि जब वह वार करे और भारत के कमजोर शासक हक्के-बक्के होकर इधर-उधर से मदद मांगने जाएं, लेकिन नतीजा वैसा ही कुछ निकले जैसा 1958 में अक्साई चिन पर चीनी सैनिकों की गश्त और कब्जे के बाद निकला था। हम हाथ ही मलते रह गए थे। यदि पूछा जाए कि दुनिया में वह कौन सा ऐसा देश है जो अपनी संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित किए गए संकल्प को दोहराने में भी लज्जा का बोध करता है तो वह देश भारत ही है। यह विडंबना है कि भारत चीन से अपनी जमीन वापस लेने के संसदीय संकल्प का जिक्र भी नहीं करता। भारत को चारो ओर से घेरने की रणनीति के अंतर्गत चीन, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, मालदीव और श्रीलंका में सक्रिय हुआ है। दूसरी ओर भारत में सक्रिय अलगाववादी संगठनों के साथ चीन की साठगांठ चलती है। नगालैंड में सक्रिय नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल आफ नगालैंड (इसाक-मुइवा गुट), असम का उल्फा और मणिपुर नेशनल लिबरेशन फ्रंट को चीन से हथियार व अन्य सहायता मिलती है। भारत के अत्यंत संवेदनशील द्वीप अंडमान निकोबार से सिर्फ चालीस किलोमीटर दूर म्यांमार स्थित कोको द्वीप में चीन ने अपना सैन्य अड्डा बनाया है। इन परिस्थितियों में भारत की राजनीति का गैरराष्ट्रीय, आत्ममुग्ध, विलासी चरित्र चीन के पक्ष में है। चीन की नीति सुलझी हुई, दीर्घकालिक, स्थिर और एकनिष्ठ है।

मलेशिया में वीभत्स जिहाद

Wednesday, September 9th, 2009

पिछले दिनों मलेशिया के सेलांगुर प्रांत की राजधानी शाह आलम में मुस्लिमों की उत्तेजित भीड़ ने नमाज के बाद शहर में निर्माणाधीन हिंदू मंदिर पर धावा बोला। उनके नेता इब्राहीम हाजी साबरी ने अपने भाषण में धमकी दी कि अगर मंदिर बनाया गया तो जो रक्तपात होगा उसके लिए हिंदू जिम्मेदार होंगे। मलेशिया को आधुनिक मुस्लिम समाज का चेहरा माना जाता रहा है। यहां 60 प्रतिशत मुस्लिम हैं, लगभग पौने तीन करोड़ की आबादी में 7 प्रतिशत हिंदू तथा शेष ईसाई और बौद्ध हैं। तेल, रबर और इलेक्ट्रानिक्स के बल पर मलेशिया दुनिया का 20वें नंबर का बड़ा निर्यातक देश है, जहां प्रति व्यक्ति आय 14 हजार डालर आंकी गई है, लेकिन क्या एक सुशिक्षित और समृद्ध आधुनिक मुस्लिम देश का सामान्य मानवाधिकारों के साथ कोई रिश्ता हो सकता है? मलेशिया में गत तीन दशकों से लगातार बढ़ रहे मुस्लिम जिहादी तेवरों से इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर ही मिलता है। वहां 250 से अधिक हिंदू मंदिर तोड़ डाले गए हैं। डेढ़ वर्ष पूर्व एक हिंदू युवती रेवती मसूसाई को शरीयत अदालत ने जबरन उसकी बेटी और पति से अलग कर मजहबी सुधार-शिविर में भेज दिया था, क्योंकि रेवती को इस्लामी कानून भंग करने का दोषी पाया गया। वहां किसी भी मुस्लिम को अपना मजहब बदल कर शादी करने पर कानूनी पाबंदी है। अधिकृत तौर पर इस्लामी राज्य मलेशिया पर जैसे-जैसे मध्य-पूर्व और अरब के धन का प्रभाव बढ़ता गया वैसे-वैसे वहां गैर मुस्लिमों के प्रति असहिष्णुता भी बढ़ी है। वहां की गठबंधन सरकार नेशनल फ्रंट में उमनो (यूनाइटेड मलय नेशनल आर्गेनाइजेशन) का वर्चस्व है, जिसमें केवल मुस्लिम ही शामिल हैं। अपने प्रभाव को और बढ़ाने के लिए वह ज्यादा से ज्यादा इस्लामी कट्टरवाद को शासकीय संरक्षण देने की नीति पर चल रहा है। अभी मलेशिया की सुप्रसिद्ध मुस्लिम माडल कांर्तिका सारी देवी सुकर्णो को बीयर पीने के जुर्म में सार्वजनिक तौर पर बेंतों से पीटने की सजा सुनाई गई। इस पर सारी दुनिया में हंगामा हो गया तो फिलहाल सजा निलंबित कर दी गई है। उस पर 5000 रिंगलिट का जुर्माना भी किया गया। फिर उसे जेल ले गए, पर वकीलों और महिला अधिकार संगठनों द्वारा शोर मचाने पर घर छोड़ गए। अब मलेशिया सरकार ने सांकेतिक सजा देने की बात कही है। पूरे विश्व में यदि कोई ऐसा इस्लामी या मुस्लिम बहुल देश ढूंढने निकले, जहां अल्पसंख्यक गैर मुस्लिमों के साथ सामान्य, एक समान और सम्मानजनक कानूनी व्यवहार किया जाता है तो शायद ऐसा एक भी देश ढूंढने में मुश्किल होगी। हो सकता है तुर्की का उदाहरण दिया जाए, पर उसके बारे में कहा जाएगा कि वह यूरोपीय प्रभाव वाला गैर इस्लामी मुस्लिम बहुल देश है। यह परिदृश्य दक्षिण एशिया और पूर्वी एशिया में हिंदू समाज के धार्मिक अधिकारों पर लगातार बढ़ रहे आघातों का एक दु:खद पहलू उजागर करता है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में तो हिंदुओं की आवाज भी उठने की गुंजाइश नहीं बची है। नेपाल दुनिया का एकमात्र संवैधानिक हिंदू राष्ट्र था। उसकी वह स्थिति भी समाप्त कर दी गई और हिंदू-हनन को सेकुलर-विजयोत्सव बना दिया गया। यह विचित्र है कि भारत चुप है। यहां के हिंदू चुप हैं, क्योंकि दुनिया में कहीं भी हिंदुओं के मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाना सेकुलरवाद के खिलाफ है। यहां के वे राजनेता जो कभी तथाकथित तौर पर हिंदू हितों की राजनीति के बल पर अपार सत्ता और ऐश्वर्य का लाभ प्राप्त करते रहे, कहीं भी, कभी भी हिंदू मानवाधिकारों पर बोलते हुए इतना शरमा-शरमा कर भीगे जाते हैं, मानो कोई गलत काम करते पकड़े गए हों। राजनेताओं द्वारा भारत में हिंदुत्व के प्रति छल ने हिंदू समाज के एकत्व और बल को तो क्षीण किया ही है, विश्व भर में हिंदुओं के मनोबल पर भी उसका गंभीर असर पड़ा है। कुछ समय पहले मैं बांग्लादेश की यात्रा पर गया था। वहां के हिंदू नेताओं ने बताया कि बांग्लादेश में हिंदू मानवाधिकारों के हनन पर वहां स्थित अमेरिकी राजदूत आवाज उठाते हैं, पर भारतीय उच्चायोग कभी कुछ नहीं बोलता। ऐसी स्थिति में हिंदू समाज केवल गैर राजनीतिक हिंदू संगठन में ही आशा की किरण खोज सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने इस संदर्भ में गैर राजनीतिक सांगठनिक कायरें के विस्तार पर काफी जोर दिया है, जिसे अपने हिंदू धर्म के प्रति संकोच या लज्जाबोध हो या जो राजनीतिक लाभ-अलाभ के तराजू पर हिंदू हितों के संबंध में आवाज उठाने या न उठाने का फैसला करे, उन तत्वों से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। विश्व में बहुलतावाद, लोकतंत्र, अन्य मत के प्रति सम्मान और समान नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए हिंदू जीवन मूल्यों की रक्षा ही एकमात्र उपाय है।

मूल्यों के संकट की महामारी

Monday, August 17th, 2009

नदियों को सुखाकर जहा आवासीय कालोनिया बनें, पशुओं को अकथनीय ढंग से तड़पा-तड़पा कर उनकी खाल से बने कोट ‘संभ्रात और कुलीन’ लोग पहनें, खेती की जमीन पर सिनेमाहाल और मल्टीप्लेक्स खोले जाएं तथा रासायनिक खाद से ‘जल्दी और ज्यादा’ फसल उगाही के लोभ में जमीन को जहरीला बनाया जाए वहा स्वाइन फ्लू तथा एड्स जैसे रोग नहीं फैलेंगे तो क्या अमृत वर्षा होगी? जिन रोगों से आज पृथ्वी आक्रांत है और अरबों डालर खर्च करने के बाद भी जिनसे निजात पाना संभव नहीं हो रहा है वे सब मनुष्य की अप्राकृतिक वासनाओं और जुगुप्साजनक सीमा तक पहुंची भोगलिप्साओं का स्वाभाविक परिणाम हैं। वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं में इनके समाधान खोजेंगे, पर प्रकृति पर विजय पाने की पश्चिमी मानसिकता ने पृथ्वी को आहत किया है। पहले उन्होंने दूसरी आस्था और समाज को बर्बरता से कुचला। कोलंबस की खोज के बाद चार करोड़ रेड इंडियन तो अमेरिका में स्वर्णभक्षी, ईसाइयत के आक्रामक प्रचारकों द्वारा किए गए संहारों में मार डाले गए। फिर सामी पंथों के जिहाद प्राय: छह करोड़ जानें लील गए। सामी पंथों की ही भाति तीसरा पंथ कम्युनिज्म उभरा, जिसके पुरोधाओं स्टालिन, माओ त्से तुंग और पोलपोट के शासन में अनुमानत: 12 करोड़ लोग बर्बरताओं के शिकार हुए और मारे गए। परमाणु बम जैसे जनसंहारक शस्त्र भी पश्चिम ने दिए। इन भोगवादी लिप्साओं के कारण पृथ्वी के प्राकृतिक वनों का घोर विनाश हुआ तथा मौसम में बदलाव आ गया। ग्लोबल वार्मिंग, कार्बन फुटप्रिंट आदि अंधाधुंध पश्चिमी औद्योगिकीकरण और प्राकृतिक नियमों के विपरीत जाकर अप्राकृतिक विश्व रचाने के परिणाम हैं। यह वह मानसिकता है जो पुरुष की पुरुष से शादी को स्वीकार्य, उचित व न्यायसंगत मानकर प्रकृति के नियमों का उपहास उड़ाती है, जो परिवार संस्था के पक्ष में दिए सब तर्क स्वच्छंद भोग की आधुनिक शैली में दफन करती है, जो स्त्री के मातृत्व को कारावास तथा डिस्को में बीयर पीकर गिर जाने को स्वातं˜य चेतना का प्रतीक मानती है, जो स्त्री की स्त्री से शादी और ‘वन नाइट स्टैंड’ को पेज थ्री की ग्लैमरस खबर बनाती है, जो पशु-पक्षियों को निर्दयता से मारकर उनके मास भक्षण को ‘नवीन युग’ का प्रतीक मानती है।

फिर स्वाइन फ्लू, एड्स, बर्ड फ्लू और मैड काऊ रोग क्यों नहीं हों? एक साल में सत्तर हजार किसानों ने भारत में आत्महत्या की। ये सत्तर हजार किसान कितनी जमीन में खेती करते थे? कितना अन्न उगाते थे? किसी ने जानने की कोशिश नहीं की। सत्तर हजार अन्नदाता भूस्वामियों की आत्महत्या ने देश का दिल नहीं दुखाया। आज व्यक्ति का मूल्याकन धन कमाने की कला में प्रवीणता से माना जाता है, विधि-विधान के औचित्य-अनौचित्य का कोई महत्व नहीं है। अरुणाचल के जंगलों से प्लाइवुड बन गई, वरुणा और असि पर मकान बन गए, भारतपुझा नदी से लेकर यमुना तक गंदा नाला बन गई है या सूख रही है, माता-पिता के लिए अनाथालय खोलने वाले करोड़पति बेटे हैं तो डल झील के सिकुड़ते जाने से लापरवाह जिहादी सिर्फ सांप्रदायिक नफरत के लिए मनुष्यों का रक्त बहा रहे हैं, तो बचेगा क्या? स्वाइन फ्लू का अर्थ है सुअर के संक्रमण से पैदा हुआ बुखार। सुअर को मारने के अजब तरीके अपनाए जाते हैं। पहले उसके नथुने काटे जाते हैं, वह तड़पता है, फिर उस पर नमक डालते हैं, वह फिर तड़पता है, इससे उसका मास इकट्ठा होता है, फिर उसे सरियों से पीटते हैं, इससे उसका मास नरम होता है। इससे भी ज्यादा बर्बरतापूर्वक गाय को मारा जाता है। ऐसे में स्वाइन फ्लू क्यों न हो?

हम वह बन जाना चाहते हैं जिसे पश्चिमी समाज अब त्याग रहा है। हम परिवार तोड़ रहे हैं, वे परिवार बचाने के तरीके ढूंढ रहे हैं। हम अपने बच्चों को न्युक्लियर फैमिली यानी दादा-दादी, नाना-नानी रहित परिवार बसाने के फैशन से जोड़ रहे हैं तो वे फैमिली ट्री यानी अपने पुरखों की वंशावली ढूंढने में हजारों डालर खर्च करते हैं। हम गे-शादियों को कानूनी जामा पहनाकर खुद को आधुनिक समझते हैं। बच्चों की परवरिश ठीक से संस्कारित कैसे हो, इसके उपाय ढूंढने भारत आते हैं। हमारे शासक और विपक्षी दल सत्ता, वैभव और व्यक्तिगत गुटबाजी को देश सेवा मान बैठे हैं। किसी भी पार्टी में संस्कारित राष्ट्रीय जीवन बचाने के संदर्भ में चर्चा और चिंतन करने का वक्त नहीं है। हमने कभी यह नहीं सुना कि कोई राजनीतिक दल देश की स्वास्थ्य सेवाओं संबंधी नीति पर राष्ट्रीय संगोष्ठी कर रहा है। सीमावर्ती जिलों तथा संवेदनशील क्षेत्रों में, जहा आतंकवाद व्याप्त है, बच्चों की शिक्षा में क्या विशेष अवयव जोड़े जा रहे हैं? क्या मणिपुर में विद्यालयों में राष्ट्रगीत पर पाबंदी और हिंदी फिल्मों की जगह कोरिया की फिल्में दिखाने से दिल्ली में बैठे किसी पक्ष-विपक्ष के नेता को दर्द होता है? लेह से तवाग तक की हिमालयी पट्टी में बच्चों का स्वास्थ्य और मानस कैसा बन रहा है, इस पर कभी संसद में चर्चा हुई? चर्चा होती है नेताओं की सुरक्षा घटाने, रोकने के बारे में।

हम मूल मानवीय संस्कारों को खत्म कर अच्छे परिणाम की आशा कैसे कर सकते हैं? इस परिदृश्य में मंगल विकास की अवधारणा सर्वाधिक उपयोगी और ग्राह्य प्रतीत होती है। प्रख्यात अर्थशास्त्री बजरंग लाल गुप्ता इन दिनों मंगल विकास की अवधारणा के कारण काफी चर्चित हैं। इस अवधारणा के मूल में मनुष्य और उसका आह्लाद है। उनका कहना है कि धन और संपदा अनिवार्यत: प्रसन्नता नहीं देते। यदि मनुष्य समाज को प्रसन्न तथा सर्वत्र सबके सुख के लिए माध्यम बनना है तो उसे प्रकृति-संरक्षण के लिए सिद्ध होकर मानवीय मूल्यों की रक्षा का दायित्व निभाना होगा। जब हम इस धर्म से च्युत होते हैं तभी स्वाइन फ्लू, एड्स, जैसे संकट आते हैं।

आत्मचिंतन का अवसर

Monday, May 18th, 2009

जब देश कठिन चुनौतियों से घिरा हो तब अपनी जीत या हार के मुद्दे को पृथक रखते हुए यह देखना चाहिए कि देश ने एक राष्ट्रीय प्रभाव वाले दल के नेतृत्व में गठबंधन सरकार का जनादेश दिया है और बंगाल में वामपंथियों का पराभव हुआ है। ये दोनों ही स्थितियां व्यापक राष्ट्रीय हित की दृष्टि से स्वागत योग्य हैं। सुरक्षा और आर्थिक चुनौतियों के मुकाबले के लिए संकीर्ण क्षेत्रीयतावादी दलों की अपेक्षा राष्ट्रीय दल का स्थायित्व देने वाला शासन अधिक स्वीकार्य होना चाहिए। इस परिणाम की न तो काग्रेस को आशा थी और न ही भाजपा को। आतंकवाद, महंगाई, बेरोजगारी, हिंदुओं के प्रति संाप्रदायिक भेदभाव और मुस्लिम तुष्टीकरण जैसे विषय सामने होते हुए काग्रेस के नेतृत्व में संप्रग जीत गया। इसका अर्थ यह कतई नहीं लगाना चाहिए कि संप्रग की विफलताओं को प्रकट करने वाले तमाम मुद्दे गलत थे या उन पर जनता उद्वेलित नहीं थी। यह वैसे ही होगा जैसे बादलों से भरे आकाश में सूर्य को अनुपस्थित मान लिया जाए। भाजपा को जिन क्षेत्रों में विजय की संभावना थी वहा वह जीती ही है। जहा से उसे अतिरिक्त सीटें मिलने की आशा थी वहा वैसा नहीं हुआ। इसका विश्लेषण करना होगा। कर्नाटक, गुजरात, मध्य प्रदेश जैसे प्रांतों में प्रखर और असंदिग्ध हिंदुत्व के साथ आम जनजीवन के विकास, शिक्षा और महिला सशक्तीकरण जैसे मुद्दे जुड़े तो विधानसभा से लोकसभा तक सफलताएं मिलीं। पारस्परिक मतैक्य, सामंजस्य और विनम्रता के साथ कार्यकर्ताओं को आत्मीय बंधन में जहा बाधा गया वहा भाजपा का विस्तार हुआ। जहा अंतरकलह अखबारों के पहले पन्ने पर छह-छह महीने छाई रही वहा हारे। भाजपा के जन्म में उस राष्ट्रवाद की रक्षा का संकल्प छिपा है जो हिंदुत्व के प्रति शर्मिंदा नहीं, गौरवान्वित करता है। अत: भाजपा को जनादेश प्रखर विचारधारा में आबद्ध संगठन विस्तार की चुनौती के रूप में लेना चाहिए और नए कलेवर के साथ पुनरोदय के लिए जुटना चाहिए। भाजपा ने गाधीवादी समाजवाद से रामरथ यात्रा तक का भी सफर तय किया है, यह याद रखना चाहिए। जब भी वह विचारधारा पर अडिग रही है उसका समर्थन बढ़ा है। उसने 2 सीटों से 184 सीटों तक का भी सफर तय किया है, यह किस आधार पर हुआ?

मुख्य बात है संख्या बल। संख्या बल तब आता है जब आत्मबल मजबूत हो। भाजपा का आत्मबल वैचारिक निष्ठा से शक्ति पाता है। अगर वैचारिक निष्ठा प्रबल नहीं है तो भाजपा और बाकी दलों में अंतर क्या रह जाएगा? अगर भाजपा ने अपने रंग को हल्का किया तो उसका जो वर्तमान जनाधार है वह न केवल अधिक दरक जाएगा, बल्कि नया जनाधार भी नहीं बनेगा। यह समय शात मन से विश्लेषण करने और निर्ममतापूर्वक उन कमियों को दूर करने का है जो भाजपा की बढ़त में बाधक हैं। अब मुख्य चुनौती अगले चुनावों में, वे जब भी हों, अपने दम पर पूर्ण बहुमत लाने के लिए काम करने की है। भाजपा की हर सरकार को पं. दीनदयाल उपाध्याय की सादगी, समर्पण, कार्यकर्ताओं से आत्मीयता और बहुमुखी जनविकास का आदर्श नमूना बनाने का प्रयास करना चाहिए। देश जिन चुनौतियों से घिरा हुआ है उसमें सत्ता पक्ष के साथ राष्ट्रीय मुद्दों पर रचनात्मक सहयोग की भूमिका लेते हुए ऐसा कड़ा विपक्ष देना चाहिए जो सरकार को किसी भी प्रश्न पर कमजोरी न दिखाने दे। संप्रग की जीत का यह अर्थ नहीं है कि क्वात्रोची जैसे मामले, सीबीआई जैसी संस्थाओं में सरकारी दखल, आतंकवाद और बेरोजगारी जैसे मुद्दे निरर्थक हो गए। कड़े विपक्ष की भूमिका में तपते हुए भाजपा को भी आत्ममंथन और आत्मसुधार का मौका मिलेगा।

सोलह मई के नतीजों ने एक ऐसे भारत की संसद चुनी है जिसके 55 प्रतिशत नागरिक गरीबी और उपेक्षा का जीवन बिता रहे हैं। लगभग 28 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा से नीचे यानी 50 रुपए प्रतिदिन से भी कम आय पर गुजारा कर रहे हैं तो 19 करोड़ की दैनिक आय 50 से 60 रुपए प्रतिदिन है और अन्य 17 करोड़ 60 से 70 रुपए प्रतिदिन पर जीवन बिता रहे हैं। 25 से 35 प्रतिशत तक मध्यवर्गीय और निम्नमध्यवर्गीय हैं तो शेष 10 प्रतिशत अमीर देश के अधिकाश संसाधनों पर नियंत्रण किए दिखते हैं। ऐसी स्थिति में उस महान और विराट भारतीय स्वप्न को साकार करने कौन सा नेतृत्व उभरकर आ सकेगा जो खतरों से घिरी भारतीय सीमा और आर्थिक बदहाली की शिकार आम भारतीय प्रजा के दु:ख निवारण के लिए ईमानदार प्रतिबद्धता के साथ शक्ति संचय कर सके? जिसे अपनी हिंदू विरासत पर शर्मिंदगी न हो, खम ठोककर स्वात से श्रीनगर तक हिंदू-सिख व्यथा दूर करने के लिए निर्भीक तेजस्विता के साथ खड़ा हो सके। वह भारतीय स्वप्न जिसमें सीमाएं सुरक्षित, शत्रु भयभीत, देशभक्त नि‌र्द्वंद्व तथा समाज विद्या, धन और आपसी सामंजस्य से परिपूर्ण हो, आज किस नेता की आखों में दिखता है? आज तो नेपाल और बांग्लादेश तक में हिंदू विरोधी तत्व हमें आखें दिखा रहे हैं।

श्रीलंका में तमिलों के साथ भीषण अत्याचार हो रहे हैं, लाखो तमिल परिवारों के शरणाथर्ीं बनने की व्यथा के प्रति भारत का राजनीतिक वर्ग पूर्णत: उदासीन दिखता है। प्रातीयतावाद इतना हावी है कि कश्मीरियों का दर्द व्यक्त करना जम्मू का दायित्व है, महाराष्ट्र या उड़ीसा का नहीं और तमिलों की वेदना पर कार्रवाई के लिए तमिलनाडु के नेता बोलेंगे, बिहार या पंजाब के नहीं। अखिल भारतीय दृष्टि और भारत के हर हिस्से की वेदना पर हर दूसरे क्षेत्र में समानरूपेण प्रतिध्वनि का भाव गहरा होने के बजाय विरल ही होता जा रहा है। इसलिए राजनीति के वर्तमान खंडित स्वरूप को एक अस्थाई और अस्वीकार्य दौर के रूप में मानकर एक ऐसी अखिल भारतीय समदृष्टि वाली राजनीति के लिए प्रयास आरंभ करने चाहिए जिसमें हर क्षेत्र की आकाक्षाओं और विकास का समानरूपेण ध्यान रखने वाला राष्ट्रीय नेतृत्व विकसित हो।

वनवासी समाज का सामाजिक योगदान महत्वपूर्ण

Saturday, May 9th, 2009

वनवासी परिवार में जन्में लोग सौभाग्यशाली हैं क्योंकि स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर प्रत्येक सामाजिक संघर्षो में इस समाज का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। शहरों की चकम-दमक से दूर आज भी ये लोग अपने को सहज, सरल व पवित्र बनाए हुये हैं जो अनुकरणीय है। उक्त बातें संघ के राष्ट्रवादी विचारक तरुण विजय ने सोमवार को वनवासी कल्याण आश्रम में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुये कही। भारतीय संस्कृति के गौरवशाली अतीत के बारे में प्रकाश डालते हुये उन्होंने कहा कि हम महान संस्कृति के वंशज हैं जो विश्र्व बंधुत्व व वसुधैव कुटुंबकम करी भावना पर विश्र्वास करती है। हमें आत्म गौरव व आत्म सम्मान को जगाना होगा क्योंकि जिस जाति ने अपने इतिहास को भुला दिया उसका भविष्य कभी उज्ज्वल नहीं हो सकता। श्री तरुण ने बच्चों का मार्गदर्शन करते हुये कहा कि आप सभी वनवासी क्षेत्रों से आए हैं। आप संकल्प ले कि आत्मनिर्भर होने के बाद इसी प्रकार पृथक-पृथक स्थानों पर वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना में तन-मन-धन व पूर्ण निष्ठा भाव से सहयोग करेंगे। इस अवसर पर डा. सत्यनारायण अग्रवाल, महीमन तुलस्यान, धुरवदास मोदी, सच्चिदा जी, प्रदीप जी, हरिकृष्ण, आदित्य अग्रवाल, श्याम सुंदर पालीवाल, मुकुन्द गोयनका, सुरेन्द्र कारीवाल, राजीव रंजन अग्रवाल, पुरुषोत्तम रामरायका, श्रीरामजी, कुसुम बुढुलाकोटी सहित आश्रम के समस्त कर्मचारी व व्यवस्थापक उपस्थित थे।

पत्रकारीय धर्म में विचारधारा बाधा नहीं

Saturday, May 9th, 2009

वरिष्ठ पत्रकार एवं राष्ट्रवादी चिंतक तरुण विजय ने कहा है कि आज का दौर भारतीय पत्रकारिता के लिए सर्वाधिक रोमांचक है। वह निर्भीकता के साथ नवीन प्रयोग तथा लीक से हटकर बहुत कुछ नया करते हुये पूरी दुनिया में कीर्तिमान रच रही है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता धर्म के पालन में विचारधारा आड़ें नहीं आनी चाहिए। इस धर्म का पालन तटस्थ भाव से होना चाहिए। सोमवार को गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब के सभागार में पत्रकारिता और आज के दौर की चुनौतियां विषयक गोष्ठी को बतौर मुख्य वक्ता संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पत्रकारिता शुद्ध रूप से व्यवसाय हो चुकी है। ऐसे में उसके मूल्य जीवित रहें और पत्रकारिता धर्म का पालन हो इसके लिए गंभीर मंथन की जरूरत है। श्री तरुण ने अंग्रेजी पत्रकारिता के बढ़ते वर्चस्व को राष्ट्र के लिए चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी मीडिया द्वारा देश में अंग्रेजियत फैलाने व हिंदी व भारतीय भाषा के साहित्य व साहित्यकारों की उपेक्षा को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। पत्रकार के किसी विचारधारा से जुड़े होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि दुनियां में कोई भी पत्रकार या संपादक विचार विहीन नहीं है। व्यक्तिगत तौर पर इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन ध्यान रहे कि विचार इस धर्म के आड़े न आयें। श्री तरुण ने भाषा की अल्पज्ञता और अध्ययन की कमी को हिंदी पत्रकारिता के लिए बड़ा संकट बताया। उन्होंने कहा कि इसका कारण अपढ और सेमी लिटरेट लोगों का पत्रकारिता में आ जाना है। जब पत्रकार को साहित्य व संस्कृति का ज्ञान ही नहीं होगा तो अच्छी खबर कैसे लिखेगा? उन्होंने समाचार पत्रों के स्थानीयकरण पर भी चिंता जतायी। उन्होंने कहा कि इससे हमारी दृष्टि संकीर्ण हुयी है और देश सिकुड़ रहा है। आज समाचार पत्रों व मीडिया में राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण खबरों का अभाव दिखता है जो कहीं से पाठक हित में नही है। दूसरी ओर बेवजह अन्तर्राष्ट्रीय खबरों और केन्द्रीय नेताओं को अनावश्यक सुर्खियां देने की प्रथा खत्म होनी चाहिए। उन्होंने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि मीडिया अमीरों का बनकर रह गया है। गरीब तथा मध्यम वर्ग जल्दी अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाते। जबकि पत्रकारिता का ऋषिधर्म ही है समाज के अंतिम व्यक्ति तक की आवाज को उठाना। आतंकवाद के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि आज भारतवर्ष आतंकवाद से सर्वाधिक ग्रस्त देश है बावजूद इसके विश्लेषण की सर्वाधिक कमी भी भारत में ही है। सेकुलर वाद के चक्कर में देश के नेता आतंकवाद के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे। उन्होंने आतंकवाद के खात्मे हेतु हिंदू-मुस्लिम को एकजुट होकर एक विचार केन्द्र बनाने की बात करने का सुझाव दिया। गोष्ठी के प्रारंभ में विषय प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ पत्रकार डा. शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने आज के दौर में पत्रकारिता की चुनौतियों को रेखांकित किया तथा कहा कि बाजार की तमाम चुनौतियों के बावजूद समाज के निर्माण में मीडिया की भूमिका अहम् है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए गोविवि के पत्रकारिता विभाग के निदेशक प्रो. आर.डी. राय ने कहा कि ज्ञान का क्षेत्र अथाह है। बदलते समय के साथ पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को लगातार अपडेट रहने की जरूरत है। विशिष्ट अतिथि कवि देवेन्द्र आर्य ने विषय पर प्रकाश डालते हुये कहा कि वर्तमान मीडिया मिशन नहीं उद्योग का रूप ले चुकी है। ऐसे में पत्रकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्र्वसनीयता बनाए रखने की है। आज संपादक और पत्रकार जैसी संस्थाओं को अधिक मजबूत करने की जरूरत है। गोष्ठी की में दिव्यप्रेम सेवा मिशन के अध्यक्ष आशीष गौतम, वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र पाण्डेय एवं पत्रकार रोहित ने भी विचार रखे। संचालन वरिष्ठ पत्रकार संजय मिश्र ने किया। इस अवसर पर प्रमुख रूप से संघ के विभाग प्रचारक श्रीराम जी, भाजपा नेत्री डा. सत्या पाण्डेय, डा. विनोद पाण्डेय, प्रदीप राव, डा. धर्मेन्द्र सिंह तथा प्रेस क्लब के महामंत्री धीरज श्रीवास्तव के अलावा बड़ी संख्या में प्रिंट एवं इलेक्टानिक मीडिया कर्मी एवं बुद्धिजीवी उपस्थित थे।

विश्व में लहराएगा हिंदुत्व का परचम

Saturday, May 9th, 2009

जो राष्ट्र व समाज अपने पूर्वजों के बलिदान को भूल जाता है उसका भविष्य कदापि स्वर्णिम नही होगा। वह दिन दूर नहीं जब हिंदुत्व का परचम पूरे विश्र्व में लहराएगा। उक्त उद्बोधन वरिष्ठ पत्रकार एवं राष्ट्र व हिंदुत्व के प्रखर चिंतक तरुण विजय ने दिया। श्री तरुण रविवार को भारत विकास परिषद के नवीन कार्यकारिणी के शपथ ग्रहण समारोह तथा 21वीं सदी का भारत विषयक संगोष्ठी को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा राजनेताओं की सत्तालोलुपता का खामियाजा आजादी के बाद से हिंदू झेल रहा है। श्री तरुण ने कहा कि हिंदुत्व व राष्ट्र की सुरक्षा सत्ता लोभी राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि देश प्रेम से ओतप्रोत युवा ही कर सकेंगे। बतौर विशिष्ट अतिथि डा. रीना श्रीवास्तव ने भारत विकास परिषद के कार्यो की सराहना करते हुये कहा कि ऐसे राष्ट्र प्रेमी संगठन के कार्यक्रम में सहभागी होकर गर्व की अनुभूति हो रही है। परिषद के प्रांतीय महासचिव एन.पी. पुष्करण ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्र व हिंदुत्व की सेवा और मानव कल्याण के मार्ग में जीवन बीते तो हम सभी का जीवन सार्थक है। इस अवसर पर परिषद के नवीन अध्यक्ष सच्चिदानंदउपाध्यक्ष आशीष रूंगटासचिव विवेक अग्रवालकोषाध्यक्ष निशान्त अग्रवालसंगठन प्रमुख हरेकृष्ण सिंह,संपर्क प्रमुख अखिलेश मोदीसंस्कार प्रमुख डा. संजीत गुप्तासेवा प्रमुख राजर्षि बंसलस्वास्थ्य प्रमुख डा. आर.पी. शुक्लडा. दीपक खेतान तथा संरक्षक मंडल के डा.महेन्द्र अग्रवालप्रदीपरमाशंकर जायसवाल एवं यशपाल सिंह के अलावा आठ नये सदस्यों को शपथ दिलाई गयी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता डा. महेन्द्र अग्रवाल व संचालन डा. संजीत गुप्त ने किया। स्वागत भाषण निवर्तमान अध्यक्ष दीपक कारीवाल ने पढ़ा। निशान्त अग्रवाल एवं अध्यक्ष सच्चिदानंद ने संस्था द्वारा किए गए कार्यो तथा भावी कार्यक्रमों की रूपरेखा प्रस्तुत की। इस दौरान पांच विकास मित्रों को अंगवस्त्र भेंटकर सम्मानित भी किया गया। समारोह में विजय कुमार सेठीमुकेश भीमसरियाश्रीमती कुसुम बुटुलाकोठीअखिलेश अग्रवालआर.पी. शुक्लसुजीत ग्रोवरसंघ के प्रचारक श्रीराम जीपूर्व विधायक अवधेश श्रीवास्तवभाजपा नेता डा. धर्मेन्द्र सिंहविश्र्वजिताशु सिंहराजेश सिंहराकेश जायसवालआनंद जालानमस्तराज शाही,जितेन्द्र रायप्रदीप रावसीताराम जायसवाल सहित बड़ी संख्या में गणमान्य अतिथि उपस्थित थे।

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