Archive for the 'Jansatta' Category
Monday, September 7th, 2009
अक्सर वे लोग भी जो यह घोषित करते नहीं अघाते कि उनका राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है, सबसे ज्यादा टिप्पणियां राजनीतिक घटनाक्रम पर करते दिखते हैं। मीडिया भी राजनीति केन्द्रित है, वह शहरी सरोकारों वाली जिस कारण अपने वास्तविक प्रभाव के अनुपात से कई गुना ज्यादा महत्व राजनेताओं को मिलता है। इस राज-रोग का असर मीडिया द्वारा दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत की पत्रकारवार्ता के समाचार प्रसारण में भी दिखा। मीडिया की दिलचस्पी सिर्फ एक पहलू में थी कि संघ के प्रमुख भारतीय जनता पार्टी के सन्दर्भ में क्या कहते हैं।
विश्व के सबसे बड़े हिन्दू संगठन के प्रमुख भाजपा के अलावा जिन महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर बोले, वह सब मीडिया ने प्रायः अनछुआ छोड़ दिया। इसमें से एक बिन्दु था विचारधारा और पांथिक भेदों से परे होते हुए उन सभी लोगों के प्रति सम्मान का भाव जिन्होंने भारत के लिए कुछ भी सकारात्मक योगदान किया हो-चाहे वह पं. नेहरू हों या कोई और। वैचारिक दृष्टि से हजार मतभेद होंगे, परन्तु यदि कोई व्यक्ति या संगठन भारत के प्रति कुछ भी, कहीं भी, कैसा भी अच्छा योगदान कर रहा है तो उसका सम्मान करना चाहिए।
इसका अर्थ है कि श्री मोहन भागवत उन सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं जो अपने-अपने स्तर पर, अपनी-अपनी पद्धति और विचारनिष्ठा से भारत का कल्याण करने में जुटे हैं। जिनकी आंखों में भारत की भलाई है और जो भारत के हित को सर्वोपरि मानते हुए विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। ऐसे लोग चाहे किसी भी मजहब को मानने वाले हों, किसी भी अन्य दल, संगठन या आन्दोलन से जुड़े हैं, उनके प्रति संघ आदर का भाव रखता है।
फिर क्या यह जरूरी है कि संघ के स्वयंसेवक राजनीति के क्षेत्र में केवल भाजपा केन्द्रित रहें? यदि विचारनिष्ठा से समझौता न करते हुए उन्हें भारत-सेवार्थ किसी भी दल में अवसर मिलता है तो उन्हें क्यों नहीं ऐसे किसी भी दल में जाना चाहिए? स्वास्थ्य, शिक्षा , ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में अनेक राजनीतिक दलों की सरकारों ने भी अच्छे काम कर दिखाए हैं जिनसे भारतीय समाज को बल मिला है। वह कैसे निरर्थक कहा जा सकता है?
इस परिदृश्य में सबसे बड़ा क्षेत्र सेवा का उभरकर सामने आया है। श्री भागवत ने अपने वक्तव्य में संघ के सेवा कार्यों का एक संक्षिप्त विवरण भी दिया जो उसे विश्व के सबसे विशाल और व्यापक सेवा-समर्पित संगठनों में अग्रणी स्थान दिलाता है। पापुमपारे (इटानगर) से पोर्ट ब्लेयर और लेह से बोलोगीर तथा नीलगिरि पर्वतमाला तक संघ प्रेरित हजारों कार्यकर्त्ता डेढ़ लाख से अधिक सेवा प्रकल्प चला रहे हैं। राजनीति का कुहासा इन कार्यों को सामने नहीं आने देता। इन सेवा कार्यों में रक्त बैंक, नेत्र बैंक, थैलीसीमिया चिकित्सा केन्द्र, अस्पताल, सचल चिकित्सा वाहन, ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों आरोग्य रक्षक कार्यकर्त्ता और आपदाग्रस्त क्षेत्रों में राहत कार्य शामिल हैं। पुणे जैसे महानगरों में स्वाइन फ्लू से ग्रस्त रोगियों की सहायता से लेकर रोकथाम के उपायों की जानकारी देने का कार्य हजारों स्वयंसेवकों ने किया और कर रहे हैं। भारतीय समाज जब कभी किसी आपदा से ग्रस्त हुआ, चाहे वह सुनामी हो या बिहार की बाढ़, संघ के स्वयं सेवक सदैव राहत कार्यों में आगे दिखे हैं। हर युद्ध के समय स्वयंसेवकों ने नागरिक स्तर पर ‘सैनिक-धर्म‘ के पालन का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया है। 1962 के समय चीनी आक्रमण के मुकाबले हेतु संघ के स्वयंसेवक हर शहर में सक्रिय हुए थे, फलस्वरूप पं. नेहरू की सरकार ने 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में स्वयंसेवकों को पूर्ण गणवेश के साथ शामिल होने का अवसर दिया जबकि सैकड़ों वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेताओं को देश विरोधी बयानों और चीन-समर्थन के अपराध में जेल में डाला गया था।
श्री मोहन भागवत ने संघ के सभी क्षेत्रों में सेवा कार्यों की कुल संख्या 157776 बतायी जिनमें से 59498 तो केवल शिक्षा क्षेत्र में हैं। स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में 38582 और आर्थिक विकास हेतु 17392 प्रकल्प चल रहे हैं। सामाजिक विकास तथा समरसता हेतु 42304 प्रकल्प पूरे देश में चल रहे हैं। इतने विराट सेवा कार्य के पीछे कितने कार्यकर्त्ताओं और उनके सहकारी बन्धुओं का सहयोग छिपा होगा क्या इसकी कल्पना सहज होगी?
इनमें से अनेक सेवा कार्यों का मैं प्रत्यक्षदर्शी हूं। ठाणे, पुणे, लातूर, संभाजीनगर, नागपुर, चित्रकूट, इन्दौर, गुवाहाटी, हाफलोंग जैसे क्षेत्रों में संघ के स्वयंसेवक सर्वश्रेष्ठ रक्त बैंक, विशाल चिकित्सालय और नेत्र बैंक चला रहे हैं। नाशिक में डॉ. हेडगेवार रुग्णालय तथा रक्त बैंक थोड़े ही समय में वहां के समाज में अपूर्व मान्यता अर्जित कर चुका है। पांच हजार से अधिक ‘बेयर फुट डाक्टर्स‘ यानी आरोग्य-रक्षक कार्यकर्त्ता उन ग्रामीण क्षेत्रों में सामान्य, वंचित तथा असहाय नागरिकों को दवा और चिकित्सा परामर्ष देते हैं, जिन तक कोई सरकारी डाक्टर नहीं पहुंचता। संभाजीनगर (औरंगाबाद) स्थित डॉ. हेडगेवार रुग्णालय के डाक्टर न केवल रोगियों की चिकित्सा करते हैं बल्कि दलित-वंचित वर्ग के मध्य सायंकालीन आरोग्य-रक्षक कक्षाएं और प्रौढ़ शिक्षा शालाएं भी चलाते हैं। जैविक खेती और ग्रामीण विकास का एक पृथक कार्य अखिल भारतीय स्तर पर चल रहा है तो गांवों में जो बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, उन तक स्कूल पहुंचाने के लिए ‘वन टीचर, वन स्कूल‘ योजना के अन्तर्गत लाखों बच्चे साक्षर बनाए जा रहे हैं और विश्व में यह ‘एकल विद्यालय‘ योजना अपने ढंग की अनूठी और प्रभावी साक्षरता-प्रसारक अभियान माना गया है। जातिभेद दूर कर सामाजिक समरसता के लिए समरसता मंच ने अनेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिणाम दिये हैं तो आई. टी. के क्षेत्र में संघ की विचारधारा से प्रेरित हजारों युवा ब्लाग्स तथा वैब साइट पर हिन्दुत्व का युद्ध लड़ रहे हैं।
सौभाग्य से संघ के नूतन सरकार्यवाह भैया जी जोशी सेवा के मूर्तिमंत रूप हैं। प्रारंभ से ही वे संघ प्रेरित सेवाकार्यों से जुड़े रहे हैं और शायद ही कोई ऐसा सेवा कार्य होगा जिस पर उनकी उपस्थिति और सक्रिय योगदान की छाप न पड़ी हो।
सरसंघचालक श्री मोहन भागवत ने भारत-विकास के कार्यों में जुटी इसी शक्ति को सज्जन-शक्ति कहा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हर वैचारिक भेद से ऊपर उठते हुए इसी सज्जन शक्ति को बढ़ाना चाहता है-राजनीतिक कार्य इस सबके सामने गौण ही तो है।
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Monday, May 18th, 2009
उस लिजलिजे से अधपके बालों वाले को भाषण देते देखना भी कष्टप्रद अनुभव था। वह क्या कह रहे थे, उसका ओर छोर भी समझ पाना कठिन था। पर सामने सोफे पर लोग बैठे उन्हें सुनने को बाध्य थे। वे प्रभावच्चाली व्यक्ति थे। उन्हें नेता कहते थे और उस पर संसदी का ठप्पा भी लगा हुआ था। भाषण खत्म होते ही मंच के बाईं ओर बिखरे तारों से पांव बचाते हुए एक बुजुर्ग कृच्चकाय सज्जन आए और उन भाषण कर चुके महाच्चय के पांव छूकर अभिवादन किया। सांसद जी ने अपने से प्रायः दुगनी आयु के व्यक्ति द्वारा पांव छूते जाते हुए उन्हें रोकने या संकोच व्यक्त करने का भी उपक्रम नहीं किया और धूर्त हंसी के साथ उनके हाथ से एप्लीकेच्चन लेकर रख ली। इतना गलीज और जुगुप्साजनक दृच्च्य था कि मन आया उस सांसद से मंच पर पूछा जाए कि तुम अपने पिता में भी ऐसे ही पांव छुआते हो क्या? पैसा और राजकर्म की गन्दगी का इतना घमंड राजनेताओं के दालानों और दफ्तरों में बड़े स्वाभाविक ढंग से लिया और नजरअंदाज कर दिया जाता है। एक ऐसे ही नेता स्वाभाविक नमस्ते का जवाब, वह भी यदि जोड़े हुए हाथों का नोटिस लिया, तो ऐसे देते थे मानो फरिच्च्तों ने आसमान से कोई मन्नत पूरी करने का संकेत किया हो। अगली बार से उसे, उसके तमाम बड़प्पन और महान कार्यों की कड़वी गोली निकालते हुए हमने नमस्ते करना ही बंद कर दिया। उसने हमें देखा, हमने उसकी आंखों में झांका और मौन कहा का हो”? उन्होंने नजर घुमा ली।
भानु जी कहते थे दिल्ली में इन बड़े लोगों के नजदीक मत जाना, मूर्तियां खंडित हो जाएंगी। तब हम दिल्ली में नए-नए थे। इन कद्दावर, गगनस्पर्च्ची लोगों को देखते तो अभिभूत रह जाते। मैंने कहा कैसे खंडित होंगी ? तो वे बोले ये जो बड़े दिखते हैं बेहद छोटे होते हैं। नजदीक जाने पर वे तमाम दाग धब्बे दिखने लगते है तब अपने मन के भीतर उनकी छवि की जगह दरक जाती है कष्ट होता है। वह कष्ट क्यों न्योता जाए?
सोलह को संसद भरी जाएगी। ज्यादातर लोग तो अच्छे ही होंगे। आजकल राजनीति में अच्छे लोगों का आना बढ़ गया है जो व्यक्तिगत लालसाओं और स्वार्थों से परे समाज सेवा की खातिर संसद में प्रवेच्च हेतु परिश्रम किया करते हैं। त्यागी, वीतरागी समाज सेवकों के मुखौटे जीभर कर देखें हैं पर संसद वाले भिन्न जात के होते हैं। उनकी तारीफ ही की जानी चाहिए वरना वे वक्र दृष्टि से प्रतिच्चोध लेना भी जानते हैं।
पर हमार साहेब क्या करें? पांव छुआए बिना जी नहीं चहकता। लगता ही नहीं है कि सांसद हो गए हैं। हमार पांव छुआ न !
इन पर जिम्मेदारी है कि देच्च चलाएं। देच्च चलाने के लिए पर्याप्त संख्या में सांसदों की भीड़ न हो तो उसे जुटाएं। कुछ भी करके जुटाएं।इ सब विचारधारा, बचूरधारा मेनीफेस्टो वगैरा का होत है बाबू? सरकरवा नहीं बनाइएगा तो एक्सपायरी डेट के बाद वाला डिब्बा बंद अचार न बन जाइएगा। पैसा खर्च करोगे तो पैसा मिलेगा ना? इसके लिए हर किसिम का मुद्दा चलेगा हिन्दू मुस्लिम कहिए, ठाकुर बिरहमन महादलित कहिए। एक बार भोट मिल जाए तो समझिए मंदिर भी बन गया, जात भी उच्चीकृत हो गई। अब ऐसे में स्वात के दर्द का मर्म कौन जानना चाहेगा ? स्वात की घाटी में जिस प्रकार हिन्दू और सिखों पर भीषण आघात हुए उनका एक पीड़ाजनक इतिहास है जिसे समझे बिना इन हमलों का वास्तविक चरित्र पहचाना नहीं जा सकता। दुःख तो इस बात का है कि भारत में इस प्रकार के आलेख छापे जा रहे हैं जिनमें पाकिस्तानी सिखों के मुंह से कहलवाया जा रहा है कि पाकिस्तान में उनकी देखभाल फूल के मानिंद हो रही है और भारत के लोगों को उनके बारे में चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। ऐसा ही एक लेख पाकिस्तान की पत्रकार मार्यना बाबर का कराची के द न्यूज’ में छपा है। असलीयत है कि उस क्षेत्र से 200 से अधिक हिन्दू सिख परिवार उजाड़ दिये गये हैं। ओराकजाई, पेच्चावर, स्वात जैसे इलाकों से लगभग सभी हिन्दू सिख परिवार उजड़ चुके हैं। ये लोग सदियों से रहते आए थे और कठिन से कठिन परिस्थिति में उन्होंने इस क्षेत्र को छोड़ा नहीं था, चाहे वे मोने हों या केच्चधारी सभी गुरुनानक देव को मानते हैं, वहां आपस में किसी प्रकार का कोई पृथकतावाद नहीं है। उन्हें तालिबानों के हमले झेलते हुए 1523 ई. में बाबर के आक्रमण के समय गुरुनानक देव के ये शब्द जरूर याद आएंगे जिसमें उन्होंने कहा था खुरासान खसमाना कीया, हिन्दुस्तान डराया”। तब बाबर सिन्धु नदी पार करके अमनाबाद तक आ पहुंचा था और उसके सैनिकों ने स्त्री, पुरुष और बच्चों पर इतने भीषण अत्याचार किए थे कि जिसे देखकर गुरुनानक देव अत्यंत संत्रस्त होकर भगवान से प्रार्थना करने लगे थे कि क्या तुम्हें निरपराध लोगों की दुर्दच्चा देखकर दया नहीं आती ऐती मार पड़ी कुरला ने तैंकी दरद ना आया।
इन बातों को याद करना भी अब व्यर्थ लगता है।
अमीर लोग, अमीरों की सरकार बनाने के लिए गरीब को चारा बनाते हैं। वोट आज गरीब, मध्यम व निम्न मध्यम वर्ग वाले देते हैं, राज अमीरों का चलता है। 28 प्रतिच्चत भारतीय आज भी गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं, 31 प्रतिच्चत उनसे बेहतर पर, निम्न मध्यम वर्ग के हैं। देच्च का 59 प्रतिच्चत वर्ग बस किसी तरह जीने की जद्दोजहद में है जो 2.5 से 7 हजार रुपये मासिक की आय में घर परिवार चला रहा है। पर इस देच्च में रूस से अधिक अरबपति हैं। उनकी आय का आंकड़ा भी सब पर लागू होता है तो देच्च की सकल घरेलू आय बढ़ती दिखती है। 10 प्रतिच्चत अमीरों का भारत के 20 प्रतिच्चत संसाधनों पर नियंत्रण है और 20 प्रतिच्चत जनता 20 प्रतिच्चत संसाधनों पर जी रही है। हर शहर में फुटपाथ पर सोते लोग गंदे नालों के इर्द-गिर्द प्लास्टिक और कपड़ों के तंबुओं में घर गिरस्ती संभालते लोग, प्लेटफार्मों पर जानवरों की तरह बैठे, वहीं से जिंदगी बिताते लोग, होटलों के बाहर जुठन समेटते और रैन बसेरों की नारकीय जिंदगी ओढ़े लोग भी भारतीय नागरिक हैं ऐसे इन नेताओं को कब लगा है जो सोलह को अनार, फुलझड़ियां, गेंदें के फूलों की मालाएं और एन्डेवर एसयूवी पर पार्टी के झंडे लगाए फरमाबरदारों की भीड़ का इंतजार कर रहे हैं।
भारतीय प्रजा के प्रति तिरस्कार और हेयता का यह बोध उन्हें मुगलों और अंग्रेंजो से उनकी जूतियों के साथ उत्तराधिकार में मिला है। प्रजा को बख्च्चीच्च दो, उसे संरक्षण में रखो, पैट्रोनाइज करो, कभी बराबरी पर न आने दो, नेटिव लोग हैं उनके बीच साइरन बजाते हुए बा अदब बा मुलाहिजा के अंदाज का छिड़काव करो। तब ये काले नेटिव कंट्रोल में रहते हैं, वरना सर पर चढ़ जाते हैं। अंगेजों की बनाई संसद, अंगेजों का बनाया वायसराय महल, अंगे्रजों का अंग्रेजी राज की रक्षा के लिए लड़ने-मरने वालों की याद में बनाया इंडिया गेट। उन इमारतों में पहले माउंटबैटन जाते थे, अब हम जाते हैं। परजा तो बाहर ही रहेगी जो बने रायबहादुर सो हमारी शाम वाली महफिल में चला जाए।
सोलह के बाद की जोड़-तोड़ में सिर्फ घोड़े बिकेंगे। आदमी, वह जो रिक्च्चा चलाता है, ग्रामीण रोजगार योजना में ठीकेदार की कमीच्चन के बाद निजी मजूरी पर गुजारा करता है, इंटरनेट से गरीबरथ का टिकट नहीं ले सकता, जो अनारक्षित कूपे में ठुंसा हुआ सफर करता है, सोलह से शुरू होने वाले महत्त्वपूर्ण गठबंधनों के सृजन-कर्म से बाहर होगा।
13 मई को मतदान का आखिरी दौर था। सोलह को डिब्बे खुले यानी मच्चीन का जलवा बिखरा। खूब विच्च्लेषण हुए। 135 उसे, 185 तुम्हें, 220 हमें, 272 तो यूं बनें बस आ ही गए। करुणानिधि से जया, जया से ममता, ममता से मायावती, मायावती से नवीन और लेफ्ट के मनमोहन। उपलब्धता की तख्तियों और मोल भाव का दौर। किसी पार्टी ने यह नहीं कहा कि जो गठबंधन हर भारतीय नागरिक को ससम्मान चिकित्सा सुविधा, च्चिक्षा और उद्यम की संरचना उपलब्ध करायाएगा। हम उसका साथ देंगे। ये सेकुलर, वो कम्युनल- ये सब बातें तो सिर्फ भाव बढ़ाने के लिए होती हैं, वरना इनका अर्थ क्या है? देच्च में सबसे शानदार और दर्च्चनीय जगह कोई हो तो वह प्राथमिक शाला होनी चाहिए। क्यों न हों ? हर भारतीय नागरिक का मूलभूत हक हो कि साफसुथरे अस्पतालों में निःच्चुल्क चिकित्सा पा सकें। क्यों न पाए? उसे अपने देच्च में यात्रा का अनुभव आनंददायक और स्वस्थ होना चाहिए। स्लीपर में सफर करिए – रेलवे में सुधार के दावे इस सदी का सबसे बड़ा घोटाला साबित होगा। गन्दगी और गरीबी के लिए अन्ततः किसे जिम्मेदार मानेंगे?
कामगार, मजूर, किसान, ग्रामीण-ठहरे हुए तालाब की काई बनकर रह गए हैं। प्रवचन और कथाएं जारी हैं। मनुष्य गायब है। देवता संसद में उतर रहे है। स्वागत कीजिए।
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Tuesday, April 7th, 2009
संजय भाई को सर्वोच्च नायालय ने टिकट देने का पात्र नहीं माना ! बहुत बुरा हुआ ! हर पार्टी में ‘भाई‘ को गले लगा कर अपने विशिष्ट सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बुलाने वाले नेता मौजूद है ! ‘भाई‘ शब्द को इस अभिनेता ने इतने मासूम और अंतर्राष्ट्रीय व्याप वाले अर्थ दे दिए की अब यह शब्द जबान पर आते ही दुबई दिखने लगाती है ! इसे कहते हैं हृदय का विस्तार ! वह अदालत द्वारा घोषित ऐसा अपराधी है की जिसे राष्ट्रद्रोही जैसा कहा जा सकता है ! उसके बारे में अदालत का फैसला पढ़ता कौन है ? अच्छा दिखता है, फिल्मी है, वोट ला सकता है, तो ले आओ ! तो फिर कसाब को भी क्यों ना टिकट देने की पेशकश की जाए ? पाकिस्तान से सबंध सुधारने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है ! कह देंगे मे हिन्दुत्ववादियों ने महाराष्ट्र पुलिस के साथ मिल कर उस पर झूठे आरोप जड़ दिए ! इस देश के कुछ उर्दू अखबारों ने तो लिखा भी था कि मुंबई हमले के पीछे मोसाद, हिन्दू राष्ट्रवादी और सीआईए के हाथ था ! तो कसाब सागर तट पर घुमते हुए सिर्फ़ अल्पसंख्यक होने के कारण पकड़ लिया गया, यह कहने में कितनी देर लगेगी ?
बस, एक बात अच्छी हुई है ! वरुण जेल में है ! हमारा बिजली, पानी, सड़क का एजेंडा खत्म कर रहा था ! आज़ादी के बाद से आज तक सारे चुनाव शिक्षा, स्वास्थ और जन-विकास के मुद्दों पर ही तो लड़े गए थे ! वरुण सारा माहोल ख़राब करने लगा तो रासुका लगाना ही पड़ा ! जवाहरलाल नेहरू के प्रपौत्र, इंदिरा गाँधी का सुपौत्र हमारे खेमे से बाहर गया तो सजा का हक़दार तो माना ही जायेगा ! न सुनवाई, न पेशी, न जाँच, न प्रक्रिया से गुजरते हुए फैसले तक पहुँचने का सब्र ! कसाब को वकील मिले, उसे सफाई देने का मौका दिया जाए , इसकी तो हम सब ने भी पैरवी की ! पर वरुण को सफाई का मौका नहीं दिया गया, वह सांप्रदायिक है ! कसाब सेक्युलर है !
कुछ और घनीभूत सेक्युलरवाद के सितारे श्रीनगर में है- जिन्हें अक्सर दिल्ली के चमकदार चर्चा-मंडलों में अपने विचार व्यक्त करने के लिए सादर आमंत्रित किया जाता है ! एक है हुर्रियत के गिलानी, जिनको तिरंगा जलाने और कश्मीर को पाकिस्तान से मिलाने जैसी मांगो के लिए जाना जाता है! उनकी चिकित्सा और सुरक्षा पर हमारे नागरिको के राजस्व का प्राय: सत्तर लाख रुपये सालाना खर्च होता है, ऐसा श्रीनगर में तैनात एक अधिकारी ने बताया ! दूसरे है यासीन मलिक ! उन पर तेईस अपराधिक मुकदमे दर्ज है ! इन में से एक है रुबिया सईद अपहरण कांड में हात होने का ! दूसरा है भारतीय वायुसेना के जांबाज अफसरों की गोली मार कर हत्या करने का ! वे अदालत से अनुमति लिए बिना विदेश चले जाते है, भारत के खिलाफ, यानी हमारे-आपके प्रिय भारतवर्ष से शत्रुता का अट्ठहासपूर्वक इजहार करते हुए बयान देते है ! अगर उनके पिछले कुछ वर्षो के कार्यक्रम देखेंगे तो पाएंगे उनकी प्रतिष्ठा सेक्युलर-समाज में एक रूमानियत से भरपूर विद्रोही युवा क्रांतिकारी की है ! उन्होंने अपराध तो कश्मीरी हिन्दुओ और सैनिको के खिलाफ किया है ! सेक्युलर है इसलिए मान्य है !
पिछले चुनावों में बिहार में उसामा बिन लादेन के हमशक्ल को साथ लेकर कौन-सा नेता मुसलमानों से वोट मांगने निकला था? क्या ऐसा नहीं लगता कि मुसलमानों की छवि ख़राब करने वालो में यही नेता और बाटला हाउस के प्रवक्ता ज्यादा जिम्मेदार होते है ? अब्दुल कलाम की किताबो के उर्दू तर्जुमा बाट कर हम मुसलिम वोट क्यों नहीं ले सकते और क्यों हमे अभद्र, अस्यभ गाली-गलौज, परस्पर विद्वेष और आतंक के संप्रदायीकरण का सहारा लेना जरुरी लगाने लगता है ? अगर ऐसा कुछ हो रहा है तो इसका जवाब वो देंगे जो अफजल का माफीनामा बनाते है और केरल में मदनी के नेतृत्त्व में चुनाव प्रबंधन से परहेज नहीं करते !
हमारे व्यवहार, संवाद और आचरण में इतनी कटुता, इतना कसैलापन और शत्रुता कहा से आई ? कल साथ थे, संधि कराने के लिए संग-संग जी-मर रहे थे! आज एक दूसरे के रक्त पिपासु है ! क्या इतना भर कह देने से काम चल जाएगा की यह तो राजनीति है- यहाँ ऐसा ही होता है ?
तो फिर जन कहां है ? राष्ट्र की अखिल भारतीय छवि किस दल की आँखों में है ?
तमिलनाडु में हमे वोट मिलेंगे, यह विश्वास न हो तो वहां उम्मीदवार खड़े ही नहीं करेंगे ! लखनऊ से खुर्जा तक उम्मीदवार खड़े कराने से काम चल जाए तो दीमापुर या सिलचर से उम्मीदवार क्यों खड़े करें ? वें हमे न जानें, हम उनकी परवाह न करें, तो भी सत्ता का खेल खेला जा सकता है!
बंगले बड़े हो रहे है देश सिकुड़ रहा है !
एक समय था जब घोर वैचारिक विरोधी के प्रति भी राजनीति में सम्मान था ! आपस में संवाद जिन्दा था !
आज सम्मान भी खत्म हो गया! संवाद भी ! अपवाद भी क्षीण हो रहा हैं !
पिछले साल, शायद, आडवाणी जी के यहा गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ था ! मनमोहन सिंह वहां आए थे ! बहुत अच्छा लगा था ! मनमोहन सिंह की नीतियों से हमारे लाख मतभेद होंगे, पर क्या यहा सच नहीं कि देश का बहुत बड़ा वर्ग उन्हें भला, सच्चा, अच्छा व्यक्ति मानता है ? ऐसे कितने लोग हैं हमारे सार्वजनिक जीवन में जो जनसामान्य में ऐसी छवि रखते हैं ? इसलिए ऐसा क्यों जरुरी होना चाहिए कि उन पर प्रहार करते हुए हम अपनी बात रखें? क्या भारत में वही सब हो, जैसा सिर्फ़ हम चाहते हैं ! क्या सब लोग सिर्फ उसी बात को सही कहें, जिसे हम सही मानते हैं ? क्या हम सिर्फ उन्ही आवाजों को सुनें जो हम बोलना चाहते हैं? फिर हममें और तालिबानों में फर्क क्या रहा, जिन्होंने कंधार में उस छोटी-सी बच्ची के चेहरे पर इसलिए तेजाब फेंक दिया था कि उसने स्कूल जाना छोड़ने से मन कर दिया था?
सिर्फ भारत का हित और उसके प्रति भक्ति ही एकमात्र कसौटी ऐसी क्यों नहीं हो सकती जो अनुलंघनीय हो ! बाकी सब पर तो संवादसंभव होना ही चाहिए ! इसी तरह प्रियंका के बयान पर तुनकमिजाजी का रवैया क्यों ? उन्होंने भली प्रकार ही तो कहा- गीता पढो ! इसमें क्या बुरा कहा ? इसे इसी रूप में क्यों न लिया जाए कि सब गीता पढें- हरेक को अपनी व्याख्या कराने का अधिकार है ! हम किसी को उस अधिकार से वंचित करने वाले होते कौन हैं ?
सभ्य समाज में परस्पर सम्मान और विमत को सुनने का धैर्य जिंदा रहना चाहिए! इसके अंत की शुरुआत राजनीति से हुई है! इसका पुनरुज्जीवन भी राजनीति से करना पड़ेगा ! जिनकी आंखो में भारत बड़ा है, वही ऐसा कर सकेंगे !
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